मां की ममता

Meri dairy


 मां के ममता में हालत, 

मेरी कुछ ऐसी होती थी। 

उसके गोद में सर रखकर,  

मै ऐसे सोती थी।। 


मां हो तो फिर किस का खतरा, 

 गम हो फिर किस बात की। 

ठंड के ठंडी में तो, 

आदत थी मेरी हर रात की।। 


अंगीठी के पास बैठी 

 मां के गोद में बैठ कर। 

 सुनती थी राजकुमारों की, 

कहानी हां हां भर कर।। 


कब का कब मैं चुप हो जाती। 

कब का कब निंद आ जाती। 

और बेखबर मैं सो जाती।। 

सुबह को जब आंख खुलता 

सोये खटिया पर पाती।। 


उठ सकती थी, जा सकती थी। 

फिर भी मैं, मां मां करती थी। 

सुन के पुकार जब वह आती थी, 

 मैं दिल से ही मुस्कुराती थी।। 


खेत खलिहान जहां वह जाती, 

 मैं उसके पीछे पड़ जाती। 

वह कहती वहां का क्या पाएगी, 

चलते चलते थक जाएगी।। 


पांव में नुकीले घांस चूभेंगे, 

गाय तुम्हें दौड़ाएगी। 

खेतों में सांप घूमते हैं। 

 नहीं नहीं तू नहीं जाएगी।। 


कुछ भी हो मैं सह लूंगी। 

मगर तुम्हारे साथ चलूंगी। 


मां भूख मुझे बार-बार लगती है, 

कौन दूध भात  खिलाएगा। 

उससे भी अगर जीना भरा तो, 

कौन दूध पिलाएगा।। 


याद तेरा बहुत आता है, 

अकेला रहा नहीं जाता है। 

पीली साड़ी पहने किसी को, 

दूर से जब देखती हूं। 

तुम आ रही है शायद घर, 

यही सोचती रहती हूं ।। 


घड़ी घड़ी तेरे आने की, 

 आहट से लगी रहती है। 

सुने घर में भी मां तेरी, 

चूड़ी क्यूँ खनकती है।। 


ना ना मां मुझे तुम ले चल, 

 याद तेरी आती है पल पल। 


खेत में हर कष्ट मै सहूंगी, 

गोद में ले लो यह ना कहूंगी।

गाय दौंड़ाएंगे मैं भाग लूंगी, 

कम से कम तेरे पास तो रहूंगी।।

Ramprakash Patel


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