धन कुबेर की नगरी को

 

धन कुबेर की नगरी 


धन कुबेर की नगरी को

जो अपनी हद तक लुटा है।


घुसे हुए हैं, अब भी लुटेरे

जो वादा है सब झुठा है। 





अनाज का खजाना चुहे के हो गए। 

खुब हगे खुब खाये, बील के रास्ते खो गए। 


रेत के बिल, दशक में ढह गए। 

सदियों तक वे खाते रह गए। 


वही लूटेरे, जब देश बटा 

तब भी यही के यहीं रहे। 

जिसने अपने ही

 मजलुम कौम को भगाया, 

अपनी कौम के नहीं रहे। 


कोई कश्मीर, कोई इलाहाबाद, 

जिसे ठीक लगा, ले लिया ताज।

जो भी हुआ पूरी मनमानी से, 

हिन्दुओं की दबी आवाज। 


तीन लुटेरे, हिन्दू को घेरे, 

सच्चे गांधी ने लुटेरों विस्वास किया। 

गांधी जी हमें छोड़कर चले गए, 

लुटेरों ने हीन्दुओं पर घात किया। 


ये चूहे हैं, ये चूहे लुटेरे हैं, 

छुपे हुए हैं, जिस जगह अंधेरे हैं।

धागे बहुत उलझ चुके हैं, 

यह तो सत्तर साल के फेरे हैं। 


इतिहास लौट कर आ चुका है, 

उगल रहा है जितना खा चुका है। 

गलत रास्ते गलत होते हैं, 

अब समझ में आ चुका है।


अब कोई जिहादी, 

जिहाद ना कर सकेगा। 

हिन्दू के हाथ जिहादी, 

कुत्ते की मौत मारेगा। 


चूहों और खरगोशों की तरह 

जनसंख्या बढ़ाना। 

पूरी कौम का जाहिल रहना, 

पढ़ना ना पढ़ाना। 


अरे जाहिलों ज्ञान लो, 

 दाढ़ी से अलग पहचान लो। 

अगर जाहिलों ना सुधरे, 

जीना मुश्किल होगा जान लो। 


वह दौर चला गया, 

जब सच छुपाया जाता था। 

उस लुटेरे सत्ता में, 

बेवक़ूफ़ बनाया जाता था।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ