फागुन

फागुन


Fagun


 है फागुन का खेला 

रंगों का मेला,

फूल चम्पा चमेली,

भाये रे बेला।


भीतर का चेहरा,

बाहर आ निकला..

पत्थर का मुखड़ा,

मोम सा पिघला।


छोड शर्म 

पहने जोकर का ताज। 

लगाकर गुलाल 

हुआ रंगीन मिजाज। 


जलाकर होली 

मलकर माथे पर राख। 

नाचे जग सारा 

ना रहना उदास। 


चुलबुल सी बचपन 

खेले और गाए। 

रंगों में डूबे 

रंगों में नहाए। 


मिले दिल मीले,

राधा और मोहन।

जग नाचे झूमें, 

कैसी सम्मोहन। 


पिचकारी की धार 

सी निकले उमंगे। 

गुलाबी गुलाबी सा

नशे में भंगे। 


बहे गीत बयार, 

मधुबन रंगीन। 

सबके लिए है, 

चांदी सा सीन। 


बड़ी भोर गई 

शुभ बीते दिन ढंग। 

सब पाए 

जो पाए मूल तीन रंग। 


Ramprakash Patel 



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