बदली बदली सी लगने लगी है

 



बदली बदली सी

लगने लगी है,

कायनात जिंदगानी।

रोना तो है,

आँखों में नहीं पानी।

उल्टी पुल्टी सी

हो गई है कहानी।।

बदली बदली सी

लगने लगी है,

कायनात जिंदगानी।


रंग दीखने लगे हैं, 

ढंग दीखने लगे हैं। 

जिसे हमने देखा नहीं था, 

वह अंग दिखने लगे हैं। 


गुरुर तो बहुत है, 

क़ाबिलियत नहीं है।

बेअक्ल हैं अक्ल की, 

तालिमीयत नहीं है।। 


तालिमात असली 

बहुत कम ने पाई, 

बहुतों ने नाम ईमान का लेकर, 

अपनी ईमान गंवाई। 


इन्सान बनो, 

बेईमान बनो। 

भारत भूमि की 

शान बनो।। 


जिस मिट्टी की है पहचान, 

आत्मा भी, रूह समान। 


हीत किसमे है तेरा, 

किसमें तेरा मधुर सबेरा। 


अहीत करे जब तालिम पुरानी, 

समझ बूझ ले रे अज्ञानी। 

बदली बदली सी

लगने लगी है,

कायनात जिंदगानी।


हम रहे सतरंगी, 

सनातन के संगी। 

पसंद तुम्हारी, 

क्यूँ हो गई बेढंगी।। 


रोना तो है 

आँखों में नहीं पानी।

उल्टी पुल्टी सी

हो गई है कहानी।।

बदली बदली सी

लगने लगी है,

कायनात जिंदगानी।


To be continued 


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