महाशिवरात्रि महाकालरात्री

 महाशिवरात्रि महाकालरात्री 

एक बार भगवान नारायण और जगत पिता ब्रह्म जी ने अपने ज्ञान योग से भगवान महाकाल शिव के विस्तार की पता लगाने के लिए ठान लिया । ब्रह्म जी अपने से नीचे की तरफ और भगवान नारायण उपर की तरफ नीकल गए।
करोड़ों सालों बाद भी भगवान महाकाल के विशाल आकार को माप नहीं सके। अन्ततः दोनों देवों ने भगवान शिव को महादेव कहा। भगवान शिव को जिन महात्माओं ने समझने की कोशिश की महाशिवरात्रि और महाकाल रात्री में खो गए। उस महाकाल के विशाल शुन्यता में ही खो गए। जिसने अपने महान ज्ञान के जोर से शिव को जानना चाहा उसके लिए शिव अत्यंत जटिल हो गए, और जिसने अपने अज्ञान के कारण भगवान शिव का तिरस्कार भी किया भगवान शिव को जान लिया, महाकाल से साक्षात्कार कर लिया। 
इसिलिये भगवान शिव को भोले नाथ भी कहा जाता है, उनके अनेक नाम ऐसे ही नहीं हैं, भक्तों ने जिस तरह से उन्हें जाना समझा और प्राप्त किया उन्होंने उनको उस तरह संबोधित किया। 
मैं आप सभी पाठकों अनजाने में हुई किसी तृटि के लिए  क्षमा प्रार्थना करता हूँ, शिव की भक्ति रूपी कालरात्रि मे गोते खाएँ और जो पाएं उसमे अपने जीवन को धन्य करें। 

Mahashivratri2022
महाशिवरात्रि 2022


वासूकी नाथ 

इस धरती का प्रथम जीव रेंगने वाले जीव थे, हालाँकि वैज्ञानिक कारणों में गहराई से जाएंगे तो धरती के प्रथम जीव मे कई मतभेद भी हैं, परंतु यह मानना कतई गलत नहीं होगा कि रेंगने वाले जीव सुरू से ही इस धरती पर जीवन का हिस्सा रहे हैं इंकार नहीं किया जा सकता है,
भगवान शिव के गले में वासुकि नाथ के होने का भी कुछ कारण है, हर भक्त का भगवान भोले नाथ के बारे में उनका नजरिया अलग हो सकता है, क्योंकि भक्त बहुत सरल हृदय का होता है, ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रेम का रास्ता ही भगवान शिव को पाने का या उनके आशीर्वाद को पाने का एक मात्र रास्ता है। क्योंकि भक्त के पास ना उतना समय है कि वह गहराई मे जाकर ईश्वर को समझ पाये ना उतना ज्ञानी है की वह ईश्वर तक पहुंचने का साधन बना सके ईश्वर ने भक्त को एक अलग ही रास्ता दिया है जिसका नाम प्रेम है और इस प्रेम की अकूत क्षमता से एक भक्त भगवान तक पहुंचने का एक सरल और आसान रास्ते का इस्तेमाल करते हैं जो उन्हें भगवान तक पहुंचने में उनकी सहायता करती है।

भगवान शिव की भेष भूषा उनके रहन सहन सब कोई भी ऐसा नहीं हैं जिसका कोई गहरा कारण है, शिव एक प्रतीक हैं, उनका अपने शरीर पर भस्म लगाना, डमरू बजाना, त्रिशूल रखना, चांद को धारण करना और माता गंगा को अपने जटाओं मे धारण करना आदि सभी भगवान शिव को सांकेतिक बनाते हैं। शिव जनमानस में एक संदेश देते हैं।
जिस प्रकार नाग उनके गले में कुंडली लगाए हुए है, वह आदि और अंत का प्रतीक है, इसलिए भगवान भोले नाथ को आदिनाथ भी कहा जाता है। वह काल का प्रतीक है जो भक्त या ज्ञानी को को यह संकेत देता है कि आदि और अंत ही शिव हैं, कहा गया है कि वासुकि ने अपने फन पर इस धरती को रखा है, जो महाकाल है वह केवल धरती को ही नहीं इस यूनिवर्स को ही अपने फन पर रख सकते हैं, एक पल मे एक नया यूनिवर्स बना सकते हैं और एक पुराना यूनिवर्स को ध्वस्त भी कर सकते हैं।

शिवलिंग 

शिवलिंग कोई एक पत्थर का टुकड़ा मात्र नहीं है, शिवलिंग मे ब्रम्हाण्ड की विशाल ऊर्जा विद्यमान रहती है, जो भगवान शिव के सांकेतिक रूप के दर्शन कर लेता है वह भगवान शिव को देखने का एक अलग दृष्टि प्राप्त कर लेता है, 
पर इसका मतलब यह नहीं है कि योगी और ज्ञानी गुरु भगवान शिव को अधिक जान सका है, वे उतना ही जाम सके हैं जितना जानने के योग्य हुए हैं। 
जिन योगियों ने भगवान शिव को पत्थर के उस लम्बे गोलाकार और  पत्थर मे भगवान शिव के उपस्थिति की पहचान की उन्होंने उस पत्थर को ऐसे ही नहीं छोड़ा या तो उन्हें देवालयों मे ले जाकर विराजमान किया या वहीं देवालय बना दिया धरती के इर्द-गिर्द अनेकों ज्योतिर्लिंग इनके प्रमाण हैं और कितने अभी खोजे भी नहीं गए हैं, और कुछ हमने खो दिए हैं हम बतौर हिन्दू उनकी रक्षा करने मे असफल रहे हैं, जैसे मक्केश्वर महादेव। 

अगर हिन्दू आज भी एक होकर अपने सनातन संस्कृति की रक्षा नहीं कर सका तो अगले दशकों सदियों मे अपने कई धार्मिक स्थल को खो सकता है, वैसे भी हमारे कई  धार्मिक स्थल दूसरे देशों की सीमाओं के अंदर हैं, और हम अपना हक खो रहे हैं, केवल आस्था से ही हम अपने धर्म की रक्षा नहीं कर सकते बल्कि हमे अपने वज़ूद को बनाए रखने के लिए संघर्ष भी करने होंगे। 
इतिहास गवाह है इस धरती पर कई महासंग्राम हुए हैं जो केवल इस सनातन सभ्यता और धर्म को बचाने के लिए ही हुए हैं। 


बेल की पत्तियाँ (बेल पत्र) 


बेल की पत्ती भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, यह भगवान के तीन नेत्रों का प्रतीक है, यहाँ मात्र तीनों नेत्र की तुलना मात्र करने से ही बेल पत्र की महानता का बखान नहीं किया जा सकता है। यह एक साधारण पेंड नहीं बल्कि एक दिव्य पेड़ है, बेल के पौधे मे बारहों महीने फल लगे रहते हैं। ऐसा पेड़ जो साल भर अपने दिव्य फलों से जगत को पाल सकता है, ठीक उसी प्रकार जैसे दूध देने वाली गाय। 
बेल का वृक्ष भगवान भोले नाथ को अति प्रिय है, बेल का फल अत्यधिक पौष्टिक, विटामिन और खनिज से परिपूर्ण होता है, पेट संबंधी रोगों का नाश करने वाला होता है, जहां योगियों और सन्यासियों को अपने फलों से आहार प्रदान करता है और इसके मोटे और मजबूत खोल के कारण दुसरे जीव इसकी ओर आकर्षित नहीं होते हैं। 
इस ब्रम्हांड मे तीन का बहुत ही गहरा मह्त्व है, विज्ञान कहता है कोई भी कण या तत्व को बनने के लिए इलेक्ट्रॉन प्रोटान और न्यूट्रॉन इन तीनों सुक्ष्म कणों का होना बहुत जरूरी है, अगर इनमें से कोई भी एक ना हो तो ना अस्तित्व वज़ूद मे नहीं आता। ब्रह्मा विष्णु और महेश आज मे खोजे गए इन कणो के पुज्य रुप है, इनका एक विशेष गुड़ होता है। जिसे  सतो गुण, रजो गुण और तमो गुण कहा जाता है। यही तीनों गुण इन कणों में भी पाया जाता है। 
चूंकि आम जन मानस को वैज्ञानिक और गणितीय व्याख्यान समझ मे नहीं आते थे इसलिए इन्हें अपने जीवन का हिस्सा या कहें जीवन की आधार को    समझने के लिए ईश्वर  अपने एक विशेष गुण के साथ धरती पर अवतरित हुआ। 
बेल के तीन दलों में इन्हीं को देखा जाता है इसलिए बेल के पत्ते का इतना महत्व है। 

महाकाल 

भगवान शिव को महाकाल बोला जाता है, महाशिवरात्रि को महाकाल रात्री बोला जाए तो कोई अजूबा नहीं होगा, 
महाकाल का शाब्दिक अर्थ यह होगा कि जो कालों का भी काल है, यहां काल के दो अर्थ हैं एक समय और दूसरा कृष्ण या काला। यहां महाकाल के दोनो अर्थों का सार्थक अर्थ है। 

समय 

समय वह जिसके तीन काल खंड हों 
पहला जो बीत गया, दूसरा जो बीत रहा है और तीसरा जो बीतने वाला है, इनमें से कोई इंसान के बस मे नहीं है, जो बीत गया है, उसके लिए कुछ किया नहीं जा सकता है, जो बीतने वाला है उसका भी हम कुछ नहीं कर सकते ये दोनों काल इंसान की पहुच मे नहीं है। 
हम वर्तमान काल को कहते हैं की वर्तमान ही हमारे बस मे है मेरा मानना है कि वर्तमान नाम का कोई काल होता ही नहीं है, जिसे हम वर्तमान काल समझते हैं वह भूतकाल और भविष्य काल के बीच की एक रेखा है और उसी रेखा अर्थार्त लाइन को हम वर्तमान कहते हैं, इसे हमे भाषा को समझने, बोलने, लिखने, बताने आदि मे आसानी हो इसलिए इस शब्द का अस्तित्व मे लाया गया। 
जिस किसी की पहूँच भूतकाल. भविष्य काल और वर्तमान काल में हो वही महाकाल हैं, वहीं कालों का काल महाकाल है।

कृष्ण या काला 

कृष्ण अर्थ मात्र काले रंग से ही नहीं है अपितु इसका एक अर्थ और भी है अथाह या दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है जिसकी कोई सीमा तय ना हो, घनघोर अंधेरा। 
आपने कभी बरसात के मौसम मे अमावस्या की काली रात को देखा होगा जब आसमान मे बादल छाए हों और बिजली ना हो, क्या आप अपने आपको देख पाएंगे जवाब है नहीं, यहां तक कि आप अपने ही हाथों को नहीं देख पाएंगे। बस इसी तरह का अंधेरा, अब आपको ऐसा प्रतीत होगा कि मैं नहीं हूं, मेरा शरीर नहीं है बल्कि मैं एक आत्मा हूं। बहूत ही सरल तरीके से आप अपने आत्मा को पहचान सकते हैं जब आपकी कोई भी इन्द्रियां काम ना कर पाने में असमर्थ हो जाए, हालाँकि अंधकार में केवल नेत्र ही अक्षम हुए हैं फिर भी आपको थोड़ा बहुत आत्मा के होने का एहसास दिलाता है। साथ में कान  से सुनाई भी ना दे और आप अपने बदन का स्पर्श ना करें और अपने आपको शून्यता के करीब ले आयें तब आप और भी अपने आपको आत्मा के करीब पाएंगे। 
पारदर्शी चिजों को छोड़कर दुनिया की हर वस्तु काली है चाहे वह सफेद या लाल रंग क्यूँ ना हो, हमे यह पहले से ज्ञातव्य है कि किसी भी वस्तु का रंग हमे तब दिखाई देता है जब वस्तु के पृष्ठ से टकराकर प्रकाश हमारे नेत्र में प्रवेष करती है। अगर प्रकाश वापस ही ना हो तो वस्तु हमे काली ही नजर आएगी। अर्थार्त कोई भी वस्तु वास्तव में अंदर से काली ही होती है जहां प्रकाश प्रवेष नहीं कर पाती। 
ज्यादातर शिवलिंग काले रंग का ही देखा जाता है, इसी काले रंग के शिवलिंग का ही भगवान शिव का प्रतीक है जो बाहर से भी काला है और अंदर से भी काला है। हालांकि सफेद रंग के शिवलिंग की भी पूजा की जाती है चूंकि उस सफेद रंग वाले शिवलिंग का भले ही रंग काला ना हो परंतु वास्तविक में वह भी अंदर से काली ही है। 
इससे यह ज्ञात होता है कि हर वस्तु में शिवत्व है, संसार कण कण में शिव है, उस सर्व समावेशी शिव को सत सत नमन। 

माया मानुषरुपिणं शशीधरम् कैलाशवासप्रियम
 संसारारणवतारणम् प्रियकरम  ज्ञानैकबोधामृतम्
अज्ञानांधविनाशिकेन विधिना शिष्यान सदाभाविनम् सो
अयं नो विद्अधातु तद्पद्मिति निखिलेश्वरः मदगुरुः।


इस लेख को आपने भक्ति भाव से पढा इसलिए आपका धन्यवाद। आपकी प्रतिक्रिया comment मे देना आवश्यक समझें. 
 नमस्कार 
Ramprakash Patel 




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