सत साहेब ते ह्रदय

 

सत साहेब ते ह्रदय

सत साहेब ते ह्रदय नू बसया, ना जान्या कि होय। 

वचन ते धरया साहेब नू, भाव ना धरया कि कोय ।। 10


 भुल्यो जनम मरन को फेरा, भूल्यो सनातन देह। 

बान्ध पगड़ी निकल्या मैदाने, किथे थारी गेह।। 11

Sat saheb te hriday


साहेब जी ना सोचया होंदा, वे बनके बड़े विहंग। 

विरया कोनु काम ना किता, काटयो आपनो पंख।। 12


जिन बन्दया तेनु ढाल रख्या, ना जान्या है कौन। 

खुद जीवै तै पुछ मुसाफिर, कौन बैठ्या है मौन।। 13


गुरु नाम तै पहुंच है थारी, पहूंचा ना सतनाम। 

जो सतनाम तै पहूँच बनावे, निकले मुख से राम।।14


चार शब्द गुरु पंथ के, बदल गयो सब अर्थ।

गुरु नाम ते सत होय, हम अपनाया ते ब्यर्थ।। 15


नाक नक्स, भेष भूषा, चेहरे की तेज है हूबहू वही। 

पगड़ी खडग तलवार, पर प्रीति नहीं राजनीत बसी।।16


कि होया तेनू जन्म लिया, लिया जीन गर्भा नू ।

अलग कर दीता, कीता कोनू धर्मा नू।। 17


तु जोड्या ना सब तोड्या, है पापानु कर्मा। 

सारा जग नु मूरख बनावै, नाम रख्या है धर्मा।। 18


कहत "प्रकाश'' जे जग बनायो ह्वै एक तरंग। 

जे तरंग सो निकल्यो सारो, बिखर्यो हजारो रंग।। 19



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